Nov 6, 2014

आख़िर


आमद की आहट सुनाई देने लगी है,
सर्द जाड़ों की बर्फ कुछ पिघलने लगी है,

वगरना इस ही गुमान में जिए जा रहे थे,
न होगा कुछ, सब तर्क किये जा रहे थे,

जैसे बुना गया था वो तिलिस्मी ग़ालीचा,
बयाबान सा दिल मेरा बना है बाग़ीचा,

फ़ितरत के सिलसिले भला सँभलते हैं कहाँ,
इस ही हसरत में फिरे यहाँ वहाँ,

की आपसे मुलाक़ात हो, आपका इस्तक़बाल करें, 
महसूस करें आपको, आपसे प्यार करें,

वक़्त ने बहुत वक़्त लगाया, आख़िर इजाज़त दी है,
देर से ही सही रूह को, आख़िर राहत मिली है। 










Dec 18, 2013

हाशिया


तेरी नज़र को दर-ब-दर,
ढूँढते जाना मेरा,

रात भर परछाईओं से,
जूझते जाना मेरा,

सबा, बाग़-ए-वफ़ा में रंग,
कुरेदते जाना मेरा,

स्याह चादर में टूटता तारा,
बीनते जाना मेरा,

तेरा आना.… चले जाना,
खिल के मुरझाना मेरा,

अक्स को तेरे पानी में,
तराशते जाना मेरा,

मिलने कि आस में तेरी,
भीड़ में गुम जाना मेरा,

और नहीं, बस और नहीं,
सफ़र किये जाना मेरा,

जी के जो ना कर सका,
मर के कर जाना मेरा,

ज़िन्दगी के हाशिये में तुझको,
दर्ज किये जाना मेरा!


                       - फ़नकार 

Aug 19, 2013

रौशनदान


रौशन हुए जाते हैं हम से,
इमारतें , बंगले, यह कोठियों के कमरे,

शाही दरबार हुए, या सरकारी दफ्तर,
दुकान, मकान, बाज़ार या घर,

खिड़की, दरीचा, दरवाज़ा, झरोंखा,
मुख्तलिफ़...हमारा अंदाज़ अनोखा,

यारी हमारी हवाओं के साथ,
नए रंग पहने हम, पहरों के साथ,

दिखाते आसमाँ के अभिन्न रंग-रूप,
नील में डूबे बादल सफ़ेद, फुहार सी फैली पीली धूप,

लड़कपन का शोर, चिड़ियों की चहक,
तशरीफ़ लाते हैं भीतर, बाग़ीचे की महक,

बसते हैं हम दीवारों में ऐसे,
चँद्रबिंदु में बिंदु सजता है जैसे!

पत्तों से लदी टहनियों से टकराकर जब भी लौट जातीं हैं,
विचरने आती हैं परछइयां, जो पीछे रह जाती हैं,


- फ़नकार